Thursday, January 7, 2010

मन कान्हा का साथ निभाना


कर कान्हा सेवा मन मेरे, मोहन का ले नाम
है गंतव्य, गति कान्हा, मनवा अब तो जान

प्यार बढ़ाना, प्यार सिखाना
मन कान्हा का साथ निभाना
रसमय, चिन्मय , करूणामय वह
उसके चरणों में रम जाना

अशोक व्यास
(७ और ८ जन २००५ की पंक्तियाँ ७ जन २०१० को लोकार्पित)

Wednesday, January 6, 2010

बैठ कृपा की नाव


आकर्षण बस कृष्ण का, और ना कोई खिंचाव
ले सुमिरन पतवार चल, बैठ कृपा की नाव


गोविन्द नाम सुना दिया, दिया जगत का कोष
कण कण है आनंद रस, क्षण क्षण है संतोष

प्रेम गीत गाता फिर, श्याम दिसे चहुँ ओर
सब शीतल, उज्जवल करे, मन में ऐसी भोर

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
(जन ६, ०५ को लिखी पंक्तियाँ
जन ६, १० को लोकार्पित)

Tuesday, January 5, 2010

नित कान्हा करे सहाय


कृष्ण नाम पालन करे
हरे ताप और पाप
एक काज कर मन सदा
श्याम नाम का जाप


अमृत सी मुस्कान से
कितना प्रेम लुटाय
डर, दुविधा व्यापे नहीं
नित कान्हा करे सहाय


विनती है कर जोरी के
ओ मेरे घनश्याम
सांस लहर तिरता रहूँ
लिए तुम्हारा नाम


अशोक व्यास

(२० फरवरी २००५ को लिखी पंक्तियाँ
५ जन २०१० को लोकार्पित )

Monday, January 4, 2010

रखना मन सबसे अपनापन


शांत सरल मन चल वृन्दावन
खा ले मनमोहन संग माखन

बिरहन को अग्नि सा लागे
अपना तो प्रेमी है सावन

सुन्दरता आई सब जग की
खेले कान्हा, मन के आंगन

नित्य उदार रहो मन मेरे
जाने कौन रूप हो वामन

सारे जग में श्याम सखा है
रखना मन सबसे अपनापन

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
(जन ४, ०५ को लिखी कविता
जन ४, १० को लोकार्पित)

Sunday, January 3, 2010

लिखना है आभार तुम्हारा ओ कान्हा


लिखना है आभार तुम्हारा ओ कान्हा
मिले निरंतर प्यार तुम्हारा ओ कान्हा

हर क्षण रसमय, हर कण चिन्मय
साँसों में उपकार तुम्हारा, ओ कान्हा

धूप छाँव का खेल रचाने वाले तुम
हर अनुभव उपकार तुम्हारा, ओ कान्हा

करुणामय हो इसीलिए कह लेता हूँ
दृष्टि हो नित द्वार तुम्हारा, ओ कान्हा

ऊँच-नीच सब छोड़ तुम्हारे चरणों में
हर कण पाया सार तुम्हारा, ओ कान्हा

मेरेपन का भान भुलाना है प्यारे
हो मेरा संसार तुम्हारा, ओ कान्हा


अशोक व्यास,
(३ सितम्बर ९७ को दिल्ली में लिखी पंक्तियाँ
३ जनवरी २०१० को अमेरिका से लोकार्पित )

Saturday, January 2, 2010

बस कान्हा दिया दिखाई


बैठ सखा कान्हा संग
खेल रचाए कितने सारे
बार बार मन में जाग्रत हैं
वो क्षण प्यारे प्यारे

कभी गुदगुदी
कभी गल बही
कभी धौल धप्पी संग चहके
वृन्दावन के पत्ते पुलकित
गान कर रहे हैं रह रह के

फिर कान्हा ने अधर बांसुरी
ऐसी तान सुनाई
सकल सृष्टि में
हम सब को
बस कान्हा दिया दिखाई

वही पवन है, वही गगन है
वही धरा, जल और अगन

श्याम सखा के संग
हो गए सकल गोपजन, मस्त-मगन
प्रीत श्याम कि अमृत अनुपम
उसका सुमिरन, भाव मधुरतम

जय जय जय कान्हा को गाऊँ
परमानंद जगाऊं
उसके लीला रस में खोकर
सारा जग पा जाऊं

अशोक व्यास
(१६ मई ०५ को लिखी गयी पंक्तियाँ
२ जन १० को लोकार्पित)

Friday, January 1, 2010



कर बात श्याम से प्रेम भरी
आनंद उजागर हो पल पल

हर बार बुला कर, भर माखन
खाए बिखराए वो चंचल

मिसरी की डली से रिझा लिया
मोहन को अंक से लगा लिया

माधव मुरलीधर गिरिधर को
अब रोम रोम में जगा लिया

अशोक व्यास
(जन २१, ०५ को लिखी पंक्तियाँ
जन १, १० को लोकार्पित )