Wednesday, February 10, 2010

कहाँ छुप गयी 'जाग'


कान्हा से कर बात मन तू
इधर उधर मत भाग

पूछ श्याम से दिन आया पर
कहाँ छुप गयी 'जाग'

अपना चिन्मय रंग श्याम का
छोड़ जगत के राग

पावन नदी समर्पण शाश्वत
मिटे जगत की आग

अशोक व्यास
२८ मई ०७ को लिखी
१० फरवरी १० को लोकार्पित 

Tuesday, February 9, 2010

उसको पाऊँ कर कौन नियम?


श्री कृष्ण प्रभु नव वस्त्र धरे
मुसकाय रहे मद्धम मद्धम
मैं अँखियाँ अंतस की कोसूं
क्यूं सूझ रहा है मुझको कम

मन भाग रहा करता किलोल
सुन सुन कर नूतन कर्म ढोल

ऐसे में कैसे बैठ सुनूं
मन मोहन मौन मधुर सरगम
मैं श्रवण रहित हो रीत गया
क्यों सुनता मुझको इतना कम


क्यूं याद नहीं रह पाता है
वह कण कण बसा हुआ हरदम
कैसे देखूं, कैसे ध्याऊँ
उसको पाऊँ कर कौन नियम?

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
७ फरवरी ०७ कि लिखी
९ फरवरी १० को लोकार्पित

Monday, February 8, 2010

समर्पण हो निरंतर

अपनी असमर्थता लिखने में भी 
प्रमाद है
साथ में ईश्वर है तो फिर कैसा
अवसाद है
सबसे पहले है वही, जो 
सबके बाद है
सच्चा सुख देने वाली, उसी प्रियतम
की याद है

जिसकी स्मृति से आल्हाद है
जिससे हर बस्ती आबाद है
उसी नन्द नंदन को
आज ये नयी फ़रियाद है

मुक्ति पथ दिखलाओ, बंधन से छुडाओ 
समर्पण हो निरंतर, ऐसा पाठ पढाओ

अशोक व्यास
१० अप्रैल ०७ को लिखी
८ फरवरी १० को लोकार्पित

Sunday, February 7, 2010

शरण बिना निस्तार नहीं है



जाने क्या खो गया कहीं पर
जैसे संकट आया भारी
लिए प्रार्थना का पावन पुल
करता जीने की तैय्यारी


शरण बिना निस्तार नहीं है
कृपा बिना तो प्यार नहीं है
हर एक सांस उपहार है उसका
बिन उसके आधार नहीं है

कोमल मन हो शांत निरंतर
गुरु अनुग्रह है संबल निर्झर
जिससे उदगम, जो अमृत घट
उसे सुमिर नित, मन मधुकर


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ मार्च ०९ को लिखी
फरवरी १० को लोकार्पित

Saturday, February 6, 2010

जगत मुक्ति का धाम


कृष्ण नाम रस पी मना
कर
लीला रस में स्नान
उस
पथ बढ़ ले प्रेम से
जिस
पथ हो उत्थान

जगत
जाल सा तब लगे
जब
बिसरे घनश्याम
सुमिरन
अमृत चख सदा
जगत
मुक्ति का धाम


अशोक व्यास
१२ मार्च ०९ को लिखी
६ फरवरी १० को लोकार्पित

Thursday, February 4, 2010

चल आनंद की बरसात करें


चल आनंद की बरसात करें
मिल जुल कान्हा की बात करें
है बाज़ी उसकी, जान- मान
बस यूँ ही शाह और मात करें

गिरिधारी मन के साथ करें
शाश्वत रक्षक दर माथ धरें
बहे पवन, संग ले प्रेम कोष
पावन मंगल, दिन-रात करें

चल आनंद की बरसात करें
सब तजें, त्रिलोकी नाथ वारेन
थिरकें उसकी ले पर प्रति पल
रससार युक्त हर बात करें

चल आनंद की बरसात करें

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ मार्च २००९ को लिखी
४ फरवरी २०१० को लोकार्पित

Wednesday, February 3, 2010

दिव्य दरस की आस में


कर कान्हा से बात मन
शोक ताप हो दूर
शीतल आनंद बरसता
करो स्नान भरपूर

दिव्य दरस की आस में
भटकूँ चारों धाम
पग पग गहरी प्यास से
नित्य पुकारूँ श्याम

गिरिधर गुण गाता रहूँ
बैठूं यमुना तीर
बस उसका ही आसरा
जिसने रचा शरीर

मंगल मन, मोहन जपे
सारा जग हर्षाय
सुमिरन रस में डूब कर
कण कण प्रेम लुटाय

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च ११, ०९ को लिखी पंक्तियाँ
३ फरवरी २०१० को लोकार्पित