Sunday, March 7, 2010

86-हर दिशा प्रेमरस छलकाए



आनंद सुधारस बरसाते
कान्हा पथ पावन कर जाते

बंशी स्वर में अलोक नया
चलना रुकना सब एक हुआ

हर दिशा प्रेमरस छलकाए 
यह स्वर्णिम मौन स्वयम आये

मन कोयल, कूके कृष्ण कृष्ण
तन्मय है कण-कण, कृष्ण कृष्ण

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ मार्च ०५ को लिखी
७ मार्च २०१० को लोकार्पित

Saturday, March 6, 2010

जीवन का आधार

कान्हा कान्हा कर सखी
मन में आये चैन
आँख खोल जब ना दिखे
बंद कर लिए नैन

कान्हा नित ह्रदय बसे
सखी ऐसा गुर सिखलाये
कहना सुनना छोड़ कर
नित गोविन्द गोविन्द गाये

मेरे भीतर नित्य है
जीवन का आधार
साथ उसी के खेल कर
सांस करे श्रृंगार 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२१ फरवरी ०५ को लिखी 
६ मार्च २०१० को लोकार्पित 

Friday, March 5, 2010

84- लेकर तेरा नाम


कृष्ण नाम पालन करे
हरे ताप और पाप,
एक काज कर मन सदा
श्याम नाम का जाप,


अमृत सी मुस्कान से
कितना प्रेम लुटाय,
दर, दुविधा व्यापे नहीं 
नित कान्हा करे सहाय

विनती है कर जोरी के
ओ मेरे घनश्याम
सांस लहर तिरता रहूँ
लेकर तेरा नाम


अशोक व्यास
२० फरवरी ०५ को लिखी
५ मार्च २०१० को लोकार्पित

Thursday, March 4, 2010

83 - जिस पथ प्रेमी कृष्ण के


धर्म- कर्म का ज्ञान हो
भक्ति से श्रीमान,
मेरे पथ, पाथेय सब
यदुपति कृपानिधान

कृष्ण प्रेम की आस है
सतसंगत की नाव,
नाम बड़ा मीठा लगे
गुरु कृपा की छाँव

प्रेम श्याम का मिल गया
और ना दूजी चाह 
जिस पथ प्रेमी कृष्ण के
वो ही अपनी राह 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ फरवरी ०५ को लिखी
४ मार्च २०१० को लोकार्पित

Wednesday, March 3, 2010

82- पग पग उसकी ताल



१ 

हर हर गंगे 
यमुना मैय्या 
कृपा नदी है
करुणा गैय्या 

मुरली स्वर से 
पुलकित करते 
धन्य कर रहे 
कृष्ण कन्हैय्या 

२ 

कान्हा का सब खेल है
कान्हा की सब चाल
हर एक मोड़ उसका नगर
पग पग उसकी ताल

कर कान्हा के काज में
मन नित जमुना तीर
हर संकट घटता गया
बढा द्रोपदी चीर


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
फरवरी १७ और १८, २००५ को लिखी
मार्च ३, २०१० को लोकार्पित

Tuesday, March 2, 2010

81 प्रेम नदी में स्नान

कृष्ण धाम चल री सखी
वहां मिलेंगे श्याम
व्याकुल नयनों को सखी
वहीं मिले विश्राम

केशव कर मुरली सजे
मुरली स्वर हैं प्राण
बडभागी है वह मनुज
जिसे कृष्ण का ध्यान

मौन तोड़ कर बोलते वृक्ष
पवन संग आज
बजा किसी के ह्रदय में
कृष्ण प्रेम का साज

चित्त चंचल, शीतल हुआ
प्रेम नदी में स्नान
मधुर करें हर एक क्षण
मेरे कृष्ण भगवान्


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ फरवरी ०५ को लिखित
२ मार्च २०१० को लोकार्पित

Monday, March 1, 2010

80 - संग खेल रहा नटवर नागर



श्री कृष्ण चन्द्र मुस्कान छटा
मन मगन मस्त
थिरके नाचे
आनंदामृत घन बरस रहे
पुण्य कोटि जन्मों के
 जागे

मुरलीधर, मोर मुकुट धारी
कान्हा पर हूँ वारि वारि
वो मुग्ध हँसे प्रेमी जन पर
हंस हंस सुनली गोपी गाही

चल हुलस हुलस
जीवन सुन्दर
संग खेल रहा
नटवर नागर

जय श्री कृष्ण

१५ फरवरी ०५ को श्यामार्पित 
१ मार्च २०१० को लोकार्पित