Monday, June 7, 2010

देह छोड़ जाने से पहले


अर्थ बताओ
अर्थ दिलाओ
कृष्ण! सखा हो
मुझे जताओ

अपनेपन का बोध जगाओ 
रसमय सुमिरन तान सधाओ
बहुत अकेला भटक लिया हूँ
अब आ जाओ, ना तरसाओ

जीवन मेरा बीत रहा है
जो कुछ है, सब रीत रहा है
अब तक जान नहीं पाया हूँ
क्या साँसों में गीत रहा है

जीवन शेष नहीं होता पर
देह छोड़ जाने से पहले
पावन पथ पर बढ़ते बढ़ते
उन्नत होना मुझे सिखाओ


मौन मधुर आया जब भीतर
रोम रोम में कान्हा का स्वर
यह उल्लास अद्वितीय उजागर
झूमूं मैं विराट धुन गाकर

अशोक व्यास
७ अक्टूबर ०७ को लिखी
७ जून २०१० को लोकार्पित

Sunday, June 6, 2010

मौज निरंतर


अमृत पथ दिखलाए कान्हा
आनंद रस बरसाए कान्हा
कृपा श्याम की अद्भुत अनुपम
प्रेम छाँव अपनाए कान्हा

परम प्रेम आनंद प्रवाह
कृष्ण कृपा की कोई ना थाह
शरण श्याम ही जीवन धन है
मौज निरंतर, वाह भई वाह!


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२९ एवं ३० सितम्बर २००७ को लिखी
६ जून २०१० को लोकार्पित

Saturday, June 5, 2010

प्रभु मुस्कान मधुर अति पावन

prabhu muskaan madhur ati paavan
nirmal, sheetal, chinmay ho man
krishna naam ras leen nirantar
sahaj base jaakar vrindavan

प्रभु मुस्कान मधुर अति पावन
निर्मल, शीतल, चिन्मय हो मन
कृष्ण नाम रस लीन निरंतर
सहज बसे जाकर वृन्दावन

जय श्री कृष्ण
अशोक व्यास
१२ सितम्बर २००७ को लिखी
५ जून २०१० को लोकार्पित

Friday, June 4, 2010

गोविन्द धाम

कर्म मर्म तुम
सत्य धर्म तुम

केशव प्यारे
नित्य सहारे

आया हूँ फिर
द्वार तुम्हारे

यदुकुल नंदन
सब दुःख भंजन
हर दम तुम से 
मिला रहे मन


अशोक व्यास
८ सितम्बर 2007 को लिखी ४ जून २०१० को लोकार्पित 

आनंद श्याम
मकरंद श्याम
चल सुमिरन पथ
गोविन्द धाम

वह प्रेम मधुर
रस दिव्य मधुर
वह कृपामयी
बहुरूप मधुर

गोपाल मनोहर गिरिधारी
 महिमा मोहन की है भारी 
गायें श्रद्धा से नर-नारी
नित यमुनाजी की बलिहारी

१० सितम्बर २००७ को लिखी
४ जून २०१० को लोकार्पित

प्रेम प्रभु का पूंजी अपनी सच्ची है
बाकी जो है, दुनियादारी कच्ची है

११ सितम्बर २००७ को लिखी
४ जून २०१० को लोकार्पित

Thursday, June 3, 2010

शरण सत्य है


मंदिर मन में बना श्याम का घूमा सकल बाज़ार
सतत संग सुन्दर अनुभूति श्याममयी संसार

दिव्य सुधारस पान कराया गुरु ने ऐसा
सब कुछ हुआ विशेष, नहीं कुछ ऐसा वैसा

योगेश्वर का नाम मिटाए है भव बंधन 
शीतल, सुरभित मन करता भक्ति का चन्दन

शरण सत्य है जान ले, ओ मुरख नादान
बिना ब्रह्म सम्बन्ध के, गुड भी फीका जान

अशोक व्यास
७ सितम्बर ०७ को लिखी
३ जून २०१० को लोकार्पित

Wednesday, June 2, 2010

बहती है आनंद धार सी


मनमोहन मन आन बसों अब 
अब तो सीमा को दूर करो सब 
चले गए हो, जान लिया है
ना जाने, फिर आओगे कब 
तुम केशव हो, तुमसे सृष्टि
बिन सुमिरन, रसहीन लगे सब

बहती है आनंद धार सी
छवि तुम्हारी दिखती जब जब

ओ गोपाला, मुरलीधर ओ
तव चरण शरण, संसार सार सब


अशोक व्यास
६ सितम्बर ०७ को लिखी
२ जून २०१० को लोकार्पित

Tuesday, June 1, 2010

सच्चा प्रियतम मधुकर श्याम


पावन, मंगल, उज्जवल श्याम
दग्ध करे सब कलिमल श्याम

निर्मल मन में शीतल श्याम
जीवन पथ का संबल श्याम

गोविन्द, माधव, मुरहर श्याम
आनंद प्रेम मनोहर श्याम

खेल करे, छुप भीतर श्याम
सच्चा प्रियतम मधुकर श्याम

अपनेपन का सागर श्याम
अनुगृह दिव्य प्रभाकर श्याम

मुस्काये, गिरिराज धारण
करुण सुधारस लाकर श्याम


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ सितम्बर २००७ को लिखी
१ जून २०१० को लोकार्पित