Wednesday, July 7, 2010

श्याम विरह की प्यारी टीस



एक दो तीन चार
हम तो हैं कान्हा के यार

पांच छः साथ आठ
प्रेम खोल देता हर गाँठ

नौ दस ग्यारह बारा
नहीं कोई कान्हा सा प्यारा 
तेरह चौदह पंद्रह सोलह
कृष्ण कृपा क सजा हिंडोला

सत्रह अठारह उन्नीस बीस
मधुरातिमाधुर मैय्या की टीस

इक्कीस बाईस तेईस चोइस
आलोकित नटवर से चहुँदिस
 
पच्चीस छब्बीस सत्ताईस अट्ठाईस
ऊखल बंधा स्वयं जगदीश 
 
उन्न्त्तीस टीस इकत्तीस बत्तीस 
उन्नत है नतमस्तक सीस

तैंतीस चोंतीस पैंतीस छतीस
श्याम विरह की प्यारी टीस

सैंतीस अडतीस उनचालीस चालीस
नंदलाल माय मन होवे निस

अशोक व्यास
४ मई २००४ को लिखी
७ जुलाई २०१० को लोकार्पित

Tuesday, July 6, 2010

सोवत कान्हा, जागत कान्हा


 
भेद मिटा सारे
पनघट पर
एक सखी हँस कर यूँ बोली

जल-नभ-पर्वत-हर पथ कान्हा
जप तप तीर्थ हर व्रत कान्हा

लगे लिखाई भी उसकी ही
पढ़े अगर मेरा ख़त कान्हा

पलक किवड़िया खुली रहे री
सोवत कान्हा, जागत कान्हा

अंग अंग से हंसी उडाये
झूठ-मूठ में रोवत कान्हा

अशोक व्यास
१२ मयी २००४ को लिखी
६ जुलाई २०१० को लोकार्पित

Monday, July 5, 2010

मेरे आत्म सखा



काम दहन करने वाले हो
या हो कामसखा

तुम रसलोभी भँवरे हो
या हो  मेरे आत्म सखा
 
'थाप' सुनूं जब द्वार बजे 
और लग जाए कोई आया
पर बंशी वाले ने तो
आ द्वार सकल हटवाया 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ मई ०४ को लिखी
४ जुलाई २०१० को लोकार्पित 


Sunday, July 4, 2010

नहीं प्रेम पर कोई रोक


1
श्याम नाम के आसरे
चले सो गोता खाय
एक सखी हँस कर कहे
बिन डूबे क्या पाय
 २
 
शब्द परे जा 
ले आलोक
नहीं प्रेम पर
कोई रोक

बहे कृपा का सार निरंतर
चल अनंत स्वर से अंतस भर

जगा नई श्रद्धा के गीत
सुनो मधुर शाश्वत संगीत 

अशोक व्यास
३१ मार्च ०४ और ११ अप्रैल ०४ को लिखी पंक्तियाँ
४ जुलाई २०१० को लोकार्पित
 

Saturday, July 3, 2010

भरो लबालब कृष्ण प्रेम से अपना अंतस



महिमा गाओ बस ठाकुर की
                                करो ना दूजी बात
जो भी बोलो, उससे बोलो
                           नित्य वही है साथ


आनंद की अनुभूति को चखो
उसका स्वाद अपने साथ रखो

बिना किसी को बताये
बिना किसी को जताए
 फल जब पक जाता है
डाली से गिर जाता है
 
भरो लबालब कृष्ण प्रेम से अपना अंतस 
नित्य मौन में सुनो, स्वयं से उसका ही यश
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२ और ३ मयी २००४ को लिखी कवितायेँ 
शनिवार ३ जुलाई २०१० को लोकार्पित


डाली से गिर जाए

Friday, July 2, 2010

मगन मधुर सब

1
नाम उजागर श्याम सखा का 
मन में हुआ सखी री
यह सुख ऐसा बिरला पावन
हो गई धन्य अहीरी 
 

ताल थपा थप 
               थप थपा थप
कान्हा किसको
         छू जाए कब

हर्षित
उल्लसित
पुलकित
प्रमुदित
करूण श्याम की
कृपा 
तरंगित

यह उल्लास करूण मनभावन
जाग्रत सतत प्रेम का सावन

करे हिलोर अनूठी आभा
ध्यानमयी हर पग, हर गप-शप
ताल थपा थप
             थप थपा थप
छू कान्हा को
                 मगन मधुर सब

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ मयी २००४ को लिखी
२ जुलाई २०१० को लोकार्पित

Thursday, July 1, 2010

जीवन भर माधुर्य रहेगा

 
कृपा दृष्टि से
उठा श्याम ने
ऐसा करतब किया
उठा मुझको 
पहुंचाया छींके तक

पर मटके की ओर
बढ़ा जब हाथ 
तो सहसा
उड़ी मटकिया 
और उसके पीछे पीछे उड़ता
गोल-गोल चक्कर खाता मैं
 झोपडिया में

ग्वाल बाल
हँसते ताली दे
देख रहे थे यह कौतुक

फिर कान्हा के ही संकेत 
रुका मटका
रुक टंगा हवा में मैं भी
पर
 माखन तक
अब भी मेरी
पहुँच नहीं थी

मन ही मन कान्हा ने पूछा 

'अब जो गिरे, फूटे धरती पर
माखन से यह भरी मटकिया
निकले मक्खन,
तुम जो गिरे 
तो क्या निकलेगा?
फिर कान्हा ही बोला हँस कर
प्रेम निकल आएगा तुमसे
पगले तुझमें प्रेम है मेरा
भरा लबालब 
 
मगन ध्यान में
करके मुझको
भाग गए हैं कान्हा के संग गोप-ग्वाल सब 

जान रहा
मेरे हिस्से का मक्खन तो
मुख पर लिपटा है
है इतना माखन कि जिससे
जीवन भर माधुर्य रहेगा

२९ अप्रैल २००४ को लिखी
१ जुलाई २०१० को लोकार्पित