Monday, February 7, 2011

मिटे कामना की परछाई

अमृत का आभास दिलाता है सुमिरन
मन का हर एक पथ हो जाता है पावन

कृष्ण सखा बंशी लेकर आया ब्रज वन
घेर खड़े हैं गोप सखा, हुए कर्ण नयन

निर्मल, निर्मल, अति निर्मल, हो शुद्ध रे मन
कृष्ण प्रेम का तब ही तो उमड़े सावन

रे मन चंचल
तज कोलाहल 
पा ले सुख सब
कर प्रेम सरल
तेरे पथ में कभी ना कोई बाधा रे
संग तेरे तो स्वयं कृष्ण और राधा रे

सत्य अंश बिसरा कर कैसे चैन मिले
श्याम दरस करने को ही तो नैन मिले

गा ले गा ले कृष्ण कन्हाई
मिटे कामना की परछाई
कृष्ण छवि में रम कर भाई
और ना कुछ बाकी रह जाई

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ जुलाई १९९८ को लिखी
७ फरवरी २०११ को लोकार्पित


Sunday, February 6, 2011

धड़कन कान्हा, कान्हा धड़कन





 कृपा से भर गया आँगन
तन-मन आनंद  मगन

अमृत का स्वाद चखाने 
अधर धरे है मुरली मोहन
 
प्यास देह से पहले वाली
बुझा रहा ये अनुग्रह सावन

परम मौन का दरसन पाया
धड़कन कान्हा, कान्हा धड़कन


अशोक व्यास
३० जून १९९८ को लिखी
६ फरवरी २०११ को परिमार्जन के साथ लोकार्पण




 

Saturday, February 5, 2011

ओ आत्म-सखा!

सत्य 
यह क्षण
उड़ती चिड़िया की बोली

मौन

आनंद का झरना
पत्तों में हवा का संगीत

शांत मन
मुझे
पूर्णता का परिचय देते तुम
ओ आत्म-सखा!
क्यूं साथ नहीं रह सकते
इसी तरह
निरंतर?
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ जून १९९८ को लिखी
५ फरवरी २०११ को लोकार्पित

Friday, February 4, 2011

तुम हो कृपानिधान

 
तुम आंसू मुस्कान दे, छलते हो त्रिपुरारी
मूढ़ हुआ मैं भूलता, तुम ही दुनिया सारी

ओ अच्युत, 
तेरी शरण 
तुम हो कृपानिधान
करो क्षमा
हर भूल को
अपना बालक जान

ना जाऊं 
महिमा तेरी
मैं तो हूँ नादान
करवाओ
करूणामय कान्हा
सुमिरन रस का पान
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ जून १९९८ को लिखी
४ फरवरी २०११ को लोकार्पित


Thursday, February 3, 2011

चेतना की इस नदी में


चेतना की इस नदी में
बह रहे
कितने किनारे टूट कर

हो सभी में
श्याम घन तुम
पर तुम्हारी वो छवि
माधुर्य और विस्तार वाली

वो कि
जिससे आये सब
जिसमें घुलेंगे
या घुले हैं
आज इस क्षण भी

चेतना तुम
यह नदी
इसकी गति तुम

भंवर रचता
छल तुम्हारा
जैसे गैय्या
जीभ से स्पर्श रचती
अपना बछडा चाटती हो

अहा यह क्षण
ना इसके आगे कुछ
ना इसके पीछे कुछ

अशोक व्यास
३ फरवरी २०११

Wednesday, February 2, 2011

श्याम नाम की माखन-मिसरी


श्याम नाम की माखन-मिसरी
जो पाऊँ दिन-रात
कहे मन में धर रहूँ
बैचेनी की बात

श्याम चरण बैठा हुआ
कृपा है अपरम्पार
कहे इस पल से परे
होवे कोई विचार

कृपा कृष्ण की संग ले
घूमूं तीनों धाम
भक्ति पथ पर बढ़ चलूँ
लिए प्रेम निष्काम

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ और १२ जून १९९८ को लिखी
२ फरवरी २०११ को लोकार्पित

Tuesday, February 1, 2011

श्याम सदा है पास


देख सुनहरी धूप को
देख वृहत आकाश
देख मगन मन की छवि
श्याम सदा है पास

बिन बाती दीपक नहीं
श्याम बिना नहीं जीव
महल बना है सांस का
श्याम नाम है नींव
 
उसका कर परनाम मन
धर उसका ही ध्यान
सांस संग बजती सदा
जिस अद्भुत की तान

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० जून १९९८ की लिखी
१ फरवरी २०११ को लोकार्पित