Saturday, August 20, 2011

कृष्ण प्रेम की प्यास


१
मन गुरु महिमा गा ले
  मन कृष्ण प्रेम पा ले
 करूणा सिन्धु, ज्ञानमेघ गुरु
 ह्रदय से अपना ले
     मन गुरु महिमा गा ले


२

कृष्ण सुनाये बांसुरी 
 कृष्ण रचाए रास 
  मन को वृन्दावन करे 
  कृष्ण प्रेम की प्यास 

   कृष्ण मिलन की आस है 
कृपा नगर में वास
  मोह लिया है कृष्ण ने 
हुआ परम विश्वास 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
  2  और ४ अप्रैल २००८ को लिखी  
 २० अगस्त २०११ को लोकार्पित

Friday, August 19, 2011

श्याम की बंशी


श्याम की बंशी सुनने 
सब सखियाँ एकत्रित हो गयीं

  श्याम कदम्बवृक्ष के टेक लगा कर खड़े हुए
 मुरली अधरों पर लगा कर

कुछ गोपियाँ प्रतीक्षा करने लगीं
  कान्हा को देखते देखते तन्मय हो गयी

  जो तन्मय नहीं हो पायीं
 वे प्रतीक्षा करती रहीं

 लौटते हुए 

 एक सखी ने दूसरी से कहा
 "आज तो कान्हा की
  बंशी ने मन मोह लिया"

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ अगस्त २०११  

Thursday, August 18, 2011

कान्हा की जय जयकार


हर अनुभव प्रसाद श्याम का
     हर क्षण में आल्हाद श्याम का

नित्य समन्वय, शांति
नित्य प्रेम विस्तार
     रोम -रोम से कर सदा
कान्हा की जय जयकार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ मार्च २००८ को लिखी
  २०११ को१८ अगस्त  लोकार्पित  

Wednesday, August 17, 2011

मन शीतल मन

मन शीतल मन
मन निर्मल मन
           मन शुद्ध सौम्य      
                                                                      नित उज्जवल मन

  मन श्याम चरण रज पाई है     
                                                                 स्वर्णिम शरणागति पाई है

 मन तन्मय, 
चिन्मय
अच्युत लय
 मन नित्य अभय

श्रद्धा संपत्ति संग
  नित शीतल मन

अशोक व्यास
१९ मार्च २००८ को लिखी
 १७ अगस्त २०११ को लोकार्पित

Tuesday, August 16, 2011

प्रीत पथ की बाधा


कान्हा ने फिर खींचा 
हाथ बढ़ा कर अपना
बोला सच्छा साथ मेरा
बाकी सब सपना

   चलते चलते  मधुर भाव
मन में जब जागा
तन्मयता से दूर हुई
प्रीत पथ की बाधा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ मार्च २००८ को लिखी
 १६ अगस्त २०११ को लोकार्पित

Monday, August 15, 2011

अलोक शिखर



१७ मार्च २००८
सोमवार
जय श्री कृष्ण


अलोक शिखर
आनंद निर्झर
मन मौन मधुर
निरखे नटवर

प्रियतम का घर
उज्जवल पथ पर
 अनुग्रह का स्वर
हो नित्य मुखर

तन्मय होकर
               निर्मल होकर           
 सब कुछ पाए
 उसका होकर 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ अगस्त २०११ को लोकार्पित  

Sunday, August 14, 2011

गुरु चरणन भज गुरु चरणन



गुरुचरणन भज गुरु चरनन
स्वर्णिम आभा पाए मन
मिटे सहज सब भव बंधन
पुष्टि करे संवित आँगन

   गुरु चरणन भज श्री चरणन

पथ मंगलमय और पावन
यहाँ सुवासित शास्त्र वचन
शुद्ध-बुद्ध निष्पाप करे  
 कृपा नाव सदगुरु दरसन

    गुरु चरणन भज गुरु चरणन

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ मार्च २००८ को लिखी
 १४ अगस्त २०११ को लोकार्पित