Thursday, July 8, 2010

समाधि सा मौन स्टेशन

 
वह नहीं दिखता
तब भी
होता है वह ही
अनाम, अरूप, निशब्द
सीमातीत मौन में
संचरित होती है
जिसकी आभा
वह बन कर कान्हा
करता है बात
रहता है साथ
सुरभित हो जाते
दिन और रात
फिर वह हँस कर छेड़ता है
कहता है
आओ, पकड़ो 
छू कर दिखाओ मुझे
 
इस तरह
उसके पीछे भाग कर
गुनगुनाने लगता
अंतस में छुपा
सौंदर्य सारा
 
इस अपार आनंन्द की लय में
सहसा होकर लीन
मुग्ध अनुभूति की दिव्य तरंग पर
मूर्तिवत
निश्चल सा
सुनता हूँ
पोर पोर से
कृपा बरखा की रिमझिम
तब
इन अद्वितीय क्षणों में
धमक कर कालातीत कृष्ण
थपकता है मुझे
पूछता शरारत से
'क्या हुआ
भूल गए क्या मुझे?"

कान्हा की समझ है रसीली
जानता है वह
मेरी बोध यात्रा का एक एक पग
 
लो फिर आ रहा 
समाधि सा मौन स्टेशन
अभी कहेगा कान्हा 'अटेंशन'
 
अशोक व्यास 
मयी १३, २००४ को लिखी गयी
जुलाई ८, २०१० को लोकार्पित

 

2 comments:

मुनीश ( munish ) said...

J.S.K. !

Prarthana gupta said...

mann ko chune wali kavita......witten a new blog. " pyala krishn naam ka" ,hope u'll like it