Saturday, November 26, 2011

His truth

So now
he readily gave up everything
nothing was in a position to tie him
nothing could restrict his movement
the joy of embracing infinite
was riding high
in his consciousness

this time
it felt like
he found his track
his train
and
his truth


Ashok Vyas
26 November 2011

Wednesday, October 19, 2011

बस कान्हा ही कान्हा है



नए सिरे से उसको थामने की चाह लेकर
इस बार
जब मैं
गोपियों के पीछे
छुपता छुपाता
कान्हा के दरस के लिए निकला
तो
एक गोपी ने मुझे देख लिया
'तू छुप छुप कर क्यों चल रहा है रे?'
मुझे पूछा
तो कोइ जवाब न था मेरे पास
दूसरी ने कहा
'इसे डर है हम इसे रोक न दें'
तीसरी बोली
'ये नहीं समझता की
इसे रोकने वाला ये खुद ही है'
चौथी ने कहा
'और ये भी देखो
सोचता है
कहीं पहुँच कर कान्हा मिलेगा
जबकी कान्हा तो यहीं है
हमारे साथ'
'पर दिखाई तो नहीं देता?' मैं बोल पड़ा
एक बुजुर्ग गोपी ने मुझ पर तरस खाकर कहा
'बेटा
कान्हा को तो मैंने भी कभी देखा नहीं
वो देखने का नहीं अनुभव करने वाला तत्त्व है
और अनुभव करने के लिए 
तुम्हें गोपियों से छुप कर
उनके पीछे नहीं
गोपी बन कर उनके साथ चलना होगा'

एक क्षण को मुझे लगा
'गोपियाँ हैं ही नहीं
बस कान्हा ही कान्हा है '



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका               

Tuesday, October 18, 2011

सुन विराट के स्वर


दिल कहता है
सुन्दर मौन छिड़क 
सारी धरती को अपनाऊँ

स्पंदन जिसका
कण कण में
गीत उसी के दोहराऊँ

मुक्त सांस में
सुन विराट के स्वर
लहरों में मिल जाऊं

उसमें डूबूं
जिससे गहराई संग
ऊंचाई पाऊँ

धुप किनारे 
खड़ा देर से
किरण किरण उसको ध्याऊँ

कहना अब
इतना कान्हा से
कहे-सुने से तर जाऊं 

अशोक व्यास
१४ नवम्बर ९९             

Sunday, October 16, 2011

मौन है सुन्दर

 
मौन है सुन्दर
कृपा नगर है
सांस श्याम संग
आठ पहर है
सबमें जाग रहा
उजियारा
पथ प्रदीप्त है
पावन प्यारा
 
दिव्य धरा है
चिद अम्बर है
क्षण क्षण शाश्वत 
सतत मुखर है
 
अमृत घट
लाये गुरुवर हैं
प्यासा हूँ
पीना छक कर है
 
गुरु दृष्टि से पीनेवाला
हो जाता ऐसा मतवाला
 
पग पग
प्रकटित दिव्य डगर है
अतुलित 
वैभव शाली घर है
 
मौन है सुन्दर
कृपा नगर है
सांस श्याम सुमिरन से
तर है 
 
 
अशोक व्यास
 
न्यूयार्क, अमेरिका       

Saturday, October 15, 2011

कैसे पकडूँ कान


नृत्य सजे प्रभु प्रेम का
या उत्तेजक बोल
बजता है हर गीत में
अजब देह का ढोल

मदिरालय कर देह को
करूँ भोग में स्नान
हाथों में है कामना
कैसे पकडूँ कान



अशोक व्यास
         (कई बरस पहले की पंक्तियाँ
प्रभु के चरणों में अर्पित )        

Friday, October 14, 2011

लिए प्रभु के बोल


सौंपूं सब नन्दलाल को
ऐसा हो ना पाए
भटके मन हो बावरा
नहीं पकड़ में आय

छोड़ दिया हरि कथा को 
फिरता मस्त मलंग
जिससे छूते श्याम संग
ढूंढें ऐसा रंग

कोयल बोले बांसुरी
कव्वा फाटा ढोल
भक्त मुखर होते सखी 
लिए प्रभु के बोल

लिख आनंद किलोल को
कर लीला का साथ
दिखा कर सृष्टि सकल
छुप गए गोपीनाथ



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
    
        

Thursday, October 13, 2011

चिर मस्ती का गान

जय श्री कृष्ण

कान्हा की मुस्कान पर सदा दीजिये ध्यान
आनंद आनंद हो रहे हर मुश्किल आसान

बिन मांगे सब दे रहा कान्हा कृपानिधान
निर्भय, निर्मल, सकल जग, सुन-सुन बंशी तान

अतुलित वैभव प्रेम का, करूणामृत अनमोल
कंकर-पत्थर छोड़ मन, बस कान्हा कान्हा बोल

अधर धरे बंशी नहीं, तब भी नयन सुजान
सुना रहे संकट हरण, चिर मस्ती का गान


अशोक व्यास
१४ दिसंबर २००६ को लिखी
१३ अक्टूबर २०११ को लोकार्पित    

Monday, October 10, 2011

कृष्ण प्रेम से सार हमारा


जय श्री कृष्ण

नाम तुम्हारा
सबसे प्यारा
ओ केशव
तू है रखवारा

बहे निरंतर
सुमिरन धारा 
कृष्ण प्रेम से
सार हमारा

मिली शक्ति
जब नाम उच्चारा
मोक्ष मिला
जब तुम्हें पुकारा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
             

Wednesday, October 5, 2011

मन कान्हा का पावन दर्पण


मन अमृत
मन वृन्दावन
मन श्याम सुन्दर
मन गोवर्धन
मन प्रेम डगर
मन श्याम नगर
मन कान्हा का
पावन दर्पण


अमृत प्यास जगाना कान्हा
अपनी और बुलाना कान्हा
जिससे महिमा बढे तुम्हारी
सिखलाना वो गाना कान्हा


अशोक व्यास
७ और ८ नवम्बर २००६ को लिखी
५ अक्टूबर २०११ को लोकार्पित              

Tuesday, October 4, 2011

दिव्य छटा री


राधा प्यारी
लाज की मारी
देखे
मोहन की पिचकारी
अंगिया भीगी
अँखियाँ रीझी
प्रेम छुपा
मुख रख दी गारी
आँगन आँगन
रंग का सावन
मधुर मुरलिया
दिव्य छटा री

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
३० नवम्बर २००६ को लिखी
४ अक्टूबर २०११ को लोकार्पित             

Saturday, October 1, 2011

प्रथम पुरस्कार


कृष्ण
कृष्ण
कृष्ण
कृष्ण
कृष्ण
सबसे अच्छे कविता लिखने की प्रतिस्पर्धा थी
सबने अपनी अपनी अनुभूतियाँ लिखी
उसने
बस एक नाम लिखा
'कृष्ण'
और
प्रथम पुरस्कार पा लिया
 
 
कृष्ण सर्वोत्तम कविता कैसे?
इस बात का जवाब देते देते
एक विश्लेषक ने कहा
'कविता वह अच्छी 
जो संक्षिप्त अभिव्यक्ति
द्वारा
विस्तृत अनुभूतियों को प्रकट करे
कविता का अविष्कार 
सुनने-पढने वाले अपने अपने भीतर करते हैं"
 
पुरस्कार तो तब है
जब
'कृष्ण' स्वयं को मेरे भीतर
खुल कर प्रकट करे

कह कर
उसने 'प्रथम पुरस्कार'
श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया
 
 
 
अशोक व्यास
वर्जिनिया, अमेरिका
१ अक्टूबर २०११   
 
   

Friday, September 30, 2011

तुम्हारी बंशी


इस बार कान्हा ने अपनी बंशी अधरों पर नहीं लगाई
उसे दे दी
कहा
'तुम बजाओ'
पर 'मैं'
मुझे तो बंशी बजाना आता ही नहीं
'मैं' कैसे ये साहस कर सकता हूँ
सारा जगत तुम्हारी बंशी सुनना चाहता है कृष्ण


कृष्ण हँसे 
तुम मेरे सामने 'मैं' से चिपके रह कर
मेरी बात न मानने का साहस कर सकते हो
पर मेरे कहे से बंशी नहीं बजा सकते?


अपनी गलती समझ कर
उसने कान पकडे
कृष्ण से कहा 'बंशी' दें

कृष्ण मुस्कुराये

अभी तुम्हारे द्वारा बंशी बजाने का 
समय नहीं आया
पर 'मैं' को छोड़ कर
इस अवसर के लिए
तैय्यारी बढाने का अवसर आया है

"मुझे पकड़ लो न
शेष सब स्वतः छूट जाएगा'


अशोक व्यास
वर्जिनिया, अमेरिका
३० सितम्बर २०११            

Tuesday, September 27, 2011

जय नंदनंदन


मनमोहन आनंद सदन
सुमिरन रस देकर
धन्य करे,
तव कोमल, उज्जवल
दिव्य दरस
मन को श्रद्धा में 
मगन करे,

बजे प्रेम बांसुरी
रोम रोम
सिरहन जागे
पावन करती
जय नंदनंदन
जग सकल करे


अशोक व्यास
२७ नवम्बर २००६ को लिखी
२७ सितम्बर २०११ को लोकार्पित        

Monday, September 26, 2011

रहते सब संसार


कान्हा तो मुसकाय रहे थे
हमहूँ न देखे
मधुर मधुर कछु गाय रहे थे
जीवन के लेखे
दरस किये जब ध्यान पडा तब
महिमा अपरम्पार
कान्हा मुरलीधर दीखते पर
रहते सब संसार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ नवम्बर २००६ को लिखी
२६ सितम्बर २०११ को लोकार्पित          

Sunday, September 25, 2011

है शरण उसी की नित संबल


श्री कृष्ण प्रभु के चरण कमल
छलके करूणा ज्योति उज्जवल
नित श्याम प्रेम पथ बढे चलो
है शरण उसी की नित संबल 



अशोक व्यास
१३ नवम्बर २००६ को लिखी
२५ सितम्बर २०११ को लोकार्पित    

Saturday, September 24, 2011

गेंद सपनो की



कभी अनुकूलता
कभी प्रतिकूलता
के खेल खिलाता है
इस तरह
कृष्ण बिहारी
हमारा ध्यान भटकाता है
जब लपकते हैं
हम पकड़ने
गेंद सपनो की
वो मुस्कुरा कर
कदम्ब वृक्ष की ओट में
छुप जाता है




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ अक्टूबर २००६ को लिखी
२४ सितम्बर २०११ को लोकार्पित           

Friday, September 23, 2011

छटपटाती पुकार

 
अर्पण 
समर्पण 
कण-कण
क्षण-क्षण
छल-चंचल
सत्य ओझल
छटपटाती पुकार
आर्त भाव पल-पल
आँगन में श्याम नहीं
मनभावन नाम नहीं
पहुँच गए अमेरिका
वृन्दावन धाम नहीं
अशोक व्यास
२७ अक्टूबर २००६ को लिखी
२३ सितम्बर २०११ को लोकार्पित          

Thursday, September 22, 2011

प्यास अमृत की

जय श्री कृष्ण


मन आनंदित
कान्हा मधुबन
बंशी बाजे
मयूर नाचे
कोयल गाये कुहू कुहू करती

बछड़ा मैय्या से अलग हुआ
भागे कान्हा की ओर

प्यास अमृत की
पाए सहज प्राप्य

कान्हा की झलक
दिखे
उर सुन्दर
सुन्दरतम के दरसन करे

मुस्कान मधुर
मन मोहन की

सब ताप हरे
संताप हरे
गिरिधारी की जय बोल प्रिये
यह आनंद है अनमोल प्रिये


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ अक्टूबर २०११ को लिखी
२२ सितम्बर २०११ को लोकार्पित                 

Wednesday, September 21, 2011

ध्यान मोहन का


अमृत बेल
ध्यान मोहन का
शाश्वत सौरभ
वृन्दावन का

नन्दलाल के
लीलारस में
है आनंद
नित्य दरसन का

अशोक व्यास
१९ अक्टूबर २००६ को लिखी
२१ सितम्बर २०११ को लोकार्पित      

Tuesday, September 20, 2011

जिससे कण-कण दीप्त निरंतर


मन आनंद अपार उतारे
कान्हा की जैकार पुकारे
जिससे कण-कण दीप्त निरंतर
हमको रहना उसी सहारे

साँसों में सपने उजियारे
पहुँच गए कान्हा के द्वारे
मौन मगन मनमोहन की धुन
इसे छोड़ मन कहीं ना जा रे


अशोक व्यास
१० अक्टूबर २००६ को लिखी
२० सितम्बर २०११ को लोकार्पित          

Monday, September 19, 2011

शिखर का आकर्षण


कहूँ न कहूँ
दिखता तो है
मुझको केंद्र बना कर
किरणों का प्रसरण
अलोक संचरण
जैसे जैसे
परिष्कृत होता जाता है प्यार
खुलता जाता है मेरा विस्तार

उदात्त आनंद के शुद्ध क्षण
रसमय कर गया समर्पण
कर रहा हर सांस पावन
उन्नत शिखर का आकर्षण


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ जनवरी २०११ को लिखी
             १9 सितम्बर २०११ को लोकार्पित              

Friday, September 16, 2011

मनमोहन की हर बात मधुर

 
कृपा लिखो मनमोहन की
या कथा लिखो मनमोहन की
आनंद अपार लुटाये है
ये छटा सांवरी चितवन की
मुरली मुख शोभा पाय गई 
झांकी अनंत अपनेपन की

मनमोहन की हर बात मधुर
बहे पवन दिव्य वृन्दावन की 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ अक्टूबर २००६ को लिखी
१६ सितम्बर २०११ को लोकार्पित   

Wednesday, September 14, 2011

उन्नत पथ ध्यान तुम्हारा है


मन भागमभाग करे कान्हा
इत-उत जाए
फिर थक जाए
जो मिले तुम्हारे दरसन में
वह चैन 
कहीं भी ना पाए

तुम गोवर्धन धारण करके 
ज्यूं इन्द्रप्रकोप मिटाते हो
तुम प्रेम पगी मुरली अपनी
वृन्दावन मधुर सुनाते हो

मन को ऐसा वर दो कान्हा
वह करे न
जिस पर पछताए
उन्नत पथ ध्यान तुम्हारा है
इसे शरण
तुम्हारी मिल जाए

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१७ नवम्बर २००६ को लिखी
१४ सितम्बर २०११ को लोकार्पित       
   

Tuesday, September 13, 2011

न जाने कैसे हरियाली छाई

(फोटो- अशोक व्यास)


उसने दोनों हाथ उठा कर
बहती पवन संग
गगन तक भेजा सन्देश
भेज दो
भेज दो
काव्य सरिता
भाव बीज लगाए हैं

पवन ने सुन कर अनसुना कर दिया
पर अज्ञात ने सुन कर
करूणा बरसाई
न जाने कैसे हरियाली छाई



हर दर तेरा दर है
मेरे श्याम सखा
ध्यान तेरा देता है
चिर आराम सखा

धन्य हुआ पाकर 
सुमिरन रस ओ कान्हा
साथ चले है हर पल
तेरा नाम सखा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका            

Monday, September 12, 2011

जिसका मन मोहन में तन्मय


मन मोहन की बात निराली
उसके संग चले हरियाली


कृष्ण सखा के साथ निकल ले
मस्ती में सब भुला के चल ले
माखन खाने का अवसर है
बस थोडा स्वभाव बदल ले


मनमोहन के नाम जीत है, नाम उसी के हार
सब कुछ जब उसका हो जाए, हर दिन है त्यौंहार

 
उत्सव साँसों में सुमिरन का, धड़कन में उल्लास
पूंजी पावन करने वाली, श्याम नाम की प्यास


अब तक जहाँ जहाँ संशय है
वहां वहां पर ठहरा भय है
जिसका मन मोहन में तन्मय
वो तो नित्य रहे निर्भय है 




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ सितम्बर २०११  
  
 

   
   

Sunday, September 11, 2011

नाम तुम्हारा रस भरा


नाम तुम्हारा रस भरा
मिले निरंतर नाथ
सारा जग अपना लगे
ऐसा तेरा साथ


जड़ता से जो मन जुड़े
उसको तुझसे जोड़
चेतन होता हूँ प्रभु
झूठे बंधन छोड़


रता रटाया बोलता
कब फूंकोगे जान
अनुभूति दो प्रेम की 
दो अनंत की तान


यहाँ-यहाँ तक हद मेरी
बैठ गया हूँ मान
कैसे कहूं असीम से
दो दो मुझको ज्ञान



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
(११ जनवरी १९९५ को भारत में लिखी
                  ११ सितम्बर २०११ को लोकार्पित )                

Saturday, September 10, 2011

गर्व तुम्हारे प्रेम का


कृपा तिहारी देख कर
गदगद हूँ भगवान्
 लिखता हूँ आभार जब 
शब्द लगे अनजान


धन मांगूं वो, जो मिले
 बन कर तेरा दास
 जहाँ रहूँ, ऐसे रहूँ 
तुझमें रहे निवास



गर्व तुम्हारे प्रेम का 
 बना रहे यदुनाथ
 तुमको ही जपता रहूँ 
कान्हाजी, दिन-रात



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
 ९ जनवरी १९९६ को जब लिखी गयी ये पंक्तियाँ
भारत में था
 १० सितम्बर २०११ को लोकार्पित

Friday, September 9, 2011

भज गोपाला


भज मन गोविन्द
 भज गोपाला,
नृत्य करे
प्यारा नंदलाला,
 पग पग
मिले सांवरा जिस पथ
चलें उसी पर
ब्रजबाला,

 गा गा श्याम नाम
 मन हर क्षण,
 श्याम मिलन का
कर ले तू प्रण,

 श्याम दरस की प्यास सांस है
जीवन
  श्याम प्रेम की शाला,
  भज मन गोविन्द
  भज गोपाला

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ जनवरी १९९५ को लिखी
 ९ सितम्बर २०११ को लोकार्पित

Thursday, September 8, 2011

समर्पण


मैं 
कान्हा के नाम से
  हर दिन नई खिड़की
खोलता
अपने अन्दर,
वह
वातावरण जगाता,
जिससे हर तरफ
मुखरित 
समर्पण स्वर,

 पर ये 'मैं', जहाँ से
शुरू होती है बात
 हर दिन
 रह ही जाता है साथ 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३१ जनवरी 2006 

Wednesday, September 7, 2011

आकर तेरे द्वार



श्याम प्रभु के साथ में
मौन मलय माधुर्य
सरल स्नेह का सार हो
धरा रहे चातुर्य

हे कान्हा
मैं प्रेम से
करूँ नित्य आभार
 वो पाया 
जो सार है
आकर तेरे द्वार

अशोक व्यास
३१ जनवरी १९९६ को लिखी
 ७ सितम्बर २०११ को लोकार्पित          

Tuesday, September 6, 2011

Jai Kanhaiyya Lal Ki

ppart 2

वही सहारा पूछूं तुमसे

जुलाई १२, १९९५ को भारत में लिखी पंक्तियाँ 
 



क्रीडा करने वाले गिरिधर
    कृपा तुम्हारी है नित सब पर
 
प्रतिदिन लिख कर पत्र
प्रभुजी, 
पता तुम्हारा पूछूं तुमसे
सदा रहे सर्वत्र
 श्याम जो      
   वही सहारा पूछूं तुमसे



छवि तुम्हारी
किसने बांधी
सबको बांधे हो तुम मोहन
सारा जग 
  हो जाए अपना
 जब जागे तुम संग अपनापन


अशोक व्यास, न्यूयार्क     

Monday, September 5, 2011

यह वैभव अपरम्पार


इतने सारे सवाल
जैसे कोई जाल
कुछ ऐसी है
समय की चाल
सन्दर्भों के सूराख
बना देते जंजाल


हर जाल को निकाल
 चेतना की दिव्य उछाल 
आनंद उंडेल कर
शुद्ध बना करती निहाल


यह वैभव अपरम्पार
नित्य आलोक का श्रृंगार
समर्पण का उपहार
सुलभ सीमातीत प्यार


   चलो हर लें यह थकन
 मिटा दें हर शिकन 
   अच्युत का संग जगाएं
  कर लें सतत सुमिरन 

अशोक व्यास
 अप्रैल २००८ को लिखी
 ५ सितम्बर २०११ को लोकार्पित
        

Sunday, September 4, 2011

अमृतमय लीला रस चख कर


सच कहता हूँ नटवर नागर
नहीं छोड़ते तुम अपना कर
पर ये भाव रंग हैं नटखट
विरह गीत गाते घर जाकर 


 तुम करूणा सागर हो गिरिधर
  कृपा तुम्हारी है नित सब पर
सहज तुम्हारे दरसन करना 
 अमृतमय लीला रस चख कर  


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ सितम्बर 2011 
  

Saturday, September 3, 2011

हर समस्या का समाधान


बैठ कर 
उनके पास
मिलता कैसा
अवकाश
थमा देता
जैसे कोई
चंचल इन्द्रियों 
की रास

यह असीम में अडिग विश्वास
सरल लगता जीवन बिना प्रयास


क्या सुनती है
 उनकी सन्निधि में    
  अपने विस्तृत रूप की तान
  कौन देता है आश्वस्ति
की मिल जाएगा
हर समस्या का समाधान 

अशोक व्यास
२० मई २००८ को
 (स्वामी श्री परमानंद गिरिजी महाराज के सामिप्य से प्रकट प्रभाव का शब्द चित्र)  

Friday, September 2, 2011

सहज अमृत गान


नींद में नहीं
जाग कर
विश्राम का
करते हैं आव्हान
विविध दृश्य 
हो जाते
 एक समान

वे हर दिन
आरती उतारते हैं 
 भोर की
देख लेते
 गहराई हर तरह के
 शोर की

मौन ऐसा 
जो विराट तक जाए
उनके भीतर
 सहज मुखरित हो पाए 

 कर लिया है
  सत्य का ऐसा अनुसंधान
   हो जाते, शब्द उनके
 सहज अमृत गान 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० मई २००८ को लिखी
   (स्वामी परमानन्द महाराज के साथ बैठने का प्रभाव)

Thursday, September 1, 2011

अपने अनंत गौरव में


मैं हैरत से देखता हूँ
अपने होने का कमाल
एक कुछ
बिना बदले
बदलता जाता हर साल

इस अपरिवर्तनीय की
बांह पकड़ कर
 क्यूं कुछ कहना 
  क्यूं  कुछ सुनना 
 बस अपने अनंत गौरव में
तन्मय होकर 
रमे रहना

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सितम्बर ३०, २००७ को लिखी
 १ सिताब्मर २०११ को लोकार्पित    

Wednesday, August 31, 2011

किनारे के मोह में


उद्गम
प्रवाह
गति
लय
अनुबंध 
उल्लास
विश्वास
महारास 


पोंछ कर
दिन-रात का अंतर
साँसों में
मुस्कुराये शिव शंकर
खोने-पाने से परे
गूँज उठा 
 अक्षय तृप्ति का स्वर 


सार
उजियारा
विस्तार
अमृत
आत्मीय पगडंडी
पीपल की छाँव
विश्रांति
विराम
खुल गया 
 पूर्णता का पैगाम 


अभी दृश्यमान
 अभी ओझल 
कौन नहीं है चंचल 


किनारे के मोह में 
  खुला नहीं लंगर 
 देख नहीं पाए 
 लहरों का घर 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३१ अगस्त २०११          

Tuesday, August 30, 2011

श्याम मेरे मैं मान गया


 
कान्हा तेरे द्वार पहुच कर जान गया
 साथ चला तू, श्याम मेरे मैं मान गया 

तेरी लीला ख़त्म नहीं होने वाली
  युग युग तेरी शान, प्रभु पहचान गया
 
 अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 



Sunday, August 28, 2011

गुरु पद चरण कमल अति पावन


दिव्य सुधा रस पान कराते
  स्निग्ध भाव में स्नान कराते 
 गुरु संबल देते हैं पग-पग
 हर मुश्किल आसान कराते


 गुरु पद चरण कमल अति पावन
बरसे नित्य कृपा मन भावन
 सुरभित साँसों में कृतज्ञता 
जाग्रत सतत प्रेम का सावन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
   

धीरज की महिमा

   
धीर बिना पूजन नहीं
   धीर बिना नहीं ध्यान
धीरज की महिमा बड़ी
सुनो लगा कर कान
  
धीरज बिन मिलते नहीं
मनमोहन घनश्याम
   बिन धीरज  हो न सके
कभी भक्त निष्काम

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ सितम्बर २००९ को लिखी
 २८ अगस्त २०११ को लोकार्पित

    

Saturday, August 27, 2011

उत्सव


हर कदम उत्सव है
 कितना अद्भुत है 
एक पाँव ज़माना
दूसरा बढ़ाना
चलते जाना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ अगस्त २०११      

Friday, August 26, 2011

प्रेम भरा पथ


चिर प्रसन्नता धारण करने का व्रत है
 नित्य श्याम में लीन रहूँ, ऐसी लत है 

  पग-पग पर ये खेल दिखे है जो उसका
 उसके देखे, बनता प्रेम भरा पथ है 

      आँखों में जो जो बदली सी उमड़े है
 उसके बरसे बढे श्याम की संगत है

 मैं अपनी हर बात भुला कर आया था
  पर यादों में अब भी मधुमय रंगत है

 अहा! प्रेम विस्तार सजाने वाले से 
  मेरा मन अब नित्य निरंतर सहमत है

अशोक व्यास
जुलाई ३०, ११ को लिखी
 २६ अगस्त २०११ को लोकार्पित  

Thursday, August 25, 2011

कान्हा के आँगन से


दिव्य सुधा रस पान कराये गिरिधारी
 नित्य कृपा में स्नान कराये गिरिधारी
अमृत सिंचन करता है उसका चिंतन
   आत्म-रूप में दरस कराये गिरिधारी

 है अनमोल श्याम का वैभव
 सुमिरन सत्य का अनुभव
  केशव का लीला रस ऐसा
 सब कुछ कर देता है संभव

माखन मिसरी भोग लगा
निर्मल मन से
 प्रीत बड़ी जाए मेरी
वृन्दावन से
धन्य हो गया जीवन 
 ऐसी कृपा हुई
 चखा है माखन अब
 कान्हा के आँगन से 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२5 अगस्त 2011 

Wednesday, August 24, 2011

श्याम मिलन

 
मन लहर लहर बहता जाए 
 पर श्याम मिलन छूटा जाए
 आनंद उतर आये उस पल
  जिस पल सुमिरन रस पा जाए

 
अब तक भटके 
इत-उत अटके 
 मन दिखलाये
लटके झटके 
 चल श्याम पिया 
का दरस करे 
जग के हर संकट 
से हटके 

 
 
मैं केशव का 
गुणगान करूँ
बंशीवाले का 
ध्यान धरूँ

जिसके चरणन
 हर तीर्थ है 
  उसके चरणन का
  ध्यान धरूँ

अशोक व्यास
१० फरवरी २००८ को लिखी
 २३ अगस्त २०११ को लोकार्पित

Tuesday, August 23, 2011

कहाँ गए नंदलाल


मन मोहन महाराज की
 मन  कर जय जयकार
जिससे सारा जग बना
उसको नित्य पुकार


आनंद लेकर अकेले नहीं बैठते गोपाल
, सबको माखन लुटा कर, कर देते निहाल

ढूंढती प्यासी निगाहें, कहाँ गए नंदलाल
  देखते देखते अदृश्य, ये कैसी चलते चाल 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ और २७ मार्च २००८ को लिखी
 २३ अगस्त २०११ को लोकार्पित

Monday, August 22, 2011

माखन प्रेमी का सत्कार


जय श्री कृष्ण
जन्माष्टमी उत्सव की बधाइयां
  नन्द के आनंद भय्यो, जय कन्हैय्या लाल की



  जय श्री कृष्ण
 यदुनंदन की जय जयकार
माखन प्रेमी का सत्कार 
उसके लीला रस में डूबें 
 जिसकी लीला अपरम्पार 

मोरपंख से मुकुट धरा कर
आया निराधार आधार 
मुख पर मोहक मधुर कांति है
जिससे छिटके शाश्वत प्यार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
२५ मार्च २००८ को लिखी
 २२ अगस्त २०११ को  लोकार्पित 

Sunday, August 21, 2011

मन आनंद आनंद गोवर्धन


मन आनंद आनंद गोवर्धन
कान्हा की लीला नित माखन
 चल प्रेम भाव से बढे चलें
कर अच्युत अर्पित हर एक यतन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
 २३ मार्च २००८ को लिखी
 l२१ अगस्त २०११ को लोकार्पित

Saturday, August 20, 2011

कृष्ण प्रेम की प्यास


मन गुरु महिमा गा ले
  मन कृष्ण प्रेम पा ले
 करूणा सिन्धु, ज्ञानमेघ गुरु
 ह्रदय से अपना ले
     मन गुरु महिमा गा ले



कृष्ण सुनाये बांसुरी 
 कृष्ण रचाए रास 
  मन को वृन्दावन करे 
  कृष्ण प्रेम की प्यास 

   कृष्ण मिलन की आस है 
कृपा नगर में वास
  मोह लिया है कृष्ण ने 
हुआ परम विश्वास 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
  2  और ४ अप्रैल २००८ को लिखी  
 २० अगस्त २०११ को लोकार्पित

Friday, August 19, 2011

श्याम की बंशी


श्याम की बंशी सुनने 
सब सखियाँ एकत्रित हो गयीं

  श्याम कदम्बवृक्ष के टेक लगा कर खड़े हुए
 मुरली अधरों पर लगा कर

कुछ गोपियाँ प्रतीक्षा करने लगीं
  कान्हा को देखते देखते तन्मय हो गयी

  जो तन्मय नहीं हो पायीं
 वे प्रतीक्षा करती रहीं

 लौटते हुए 

 एक सखी ने दूसरी से कहा
 "आज तो कान्हा की
  बंशी ने मन मोह लिया"

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ अगस्त २०११  

Thursday, August 18, 2011

कान्हा की जय जयकार


हर अनुभव प्रसाद श्याम का
     हर क्षण में आल्हाद श्याम का

नित्य समन्वय, शांति
नित्य प्रेम विस्तार
     रोम -रोम से कर सदा
कान्हा की जय जयकार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ मार्च २००८ को लिखी
  २०११ को१८ अगस्त  लोकार्पित  

Wednesday, August 17, 2011

मन शीतल मन

मन शीतल मन
मन निर्मल मन
           मन शुद्ध सौम्य      
                                                                      नित उज्जवल मन

  मन श्याम चरण रज पाई है     
                                                                 स्वर्णिम शरणागति पाई है

 मन तन्मय, 
चिन्मय
अच्युत लय
 मन नित्य अभय

श्रद्धा संपत्ति संग
  नित शीतल मन

अशोक व्यास
१९ मार्च २००८ को लिखी
 १७ अगस्त २०११ को लोकार्पित