Monday, August 16, 2010

सेवा में श्रीकृष्ण की


मैं ही क्यूं ढूंढूं सदा, उसके दर की राह
कान्हा को भी तो कभी, हो मेरी परवाह 
(१६ अगस्त २०१० को लिखी पंक्तियाँ)
पहले २ फरवरी १९९५ में लिखा था
'लौटूं उसके द्वार पर, ढूंढ रही हूँ राह
होगी कान्हा को कभी तो मेरे परवाह 

सम्बन्ध हो तो रूठने- मनाने, दोनों का खेल ठीक है
सम्बन्ध है, इसको पहचानो, यही गुरु की सीख है 
(१६ अगस्त २०१०)
सेवा में श्रीकृष्ण की, सुन्दरतम के साथ
अहा धन्य वो, जो नहीं, जाने दूजी बात

कान्हा प्रीती का सखी, चखा मुझे भी स्वाद
एक-एक पग तीरथ लगे, ले कान्हा की याद

मनमोहन प्रियतम मेरा, नित्य पुकारूं श्याम
जानूं बस इतना सखी, मैं सांसों का काम 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
(२ फरवरी १९९५ को लिखी कवितायेँ)

2 comments:

रवि कान्त शर्मा said...

बहुत सुन्दर एहसास!
कान्हा प्रीती का सखी, चखा मुझे भी स्वाद।
एक-एक पग तीरथ लगे, ले कान्हा की याद॥

दिल की धडकन से एहसास तुम्हारा होता है।
थामे कोई हाथ तो वो हाथ तुम्हारा होता है॥

nilesh mathur said...

बहुत सुन्दर !