Monday, August 23, 2010

प्रेम प्रवाह शब्द !

 
ठहरो शब्द
छू लो उसे
खो जाओ उसमें
मिट जाए शोर तुम्हारा
उमड़े स्वर्णिम शांत धारा

तोड़ कर
आकार अपना
बह निकलो
स्वतः ही
उसका गान करती नदी से
निश्छल
निर्मल
कल कल
खनकाते
आनद सरल

प्रेम प्रवाह शब्द !
तुम ही
चेतना हो
प्राण हो

जय श्री कृष्ण

अशोक व्यास
३ मार्च १९९५ को लिखी
२३ अगस्त २०१० को लोकार्पित

1 comment:

वन्दना said...

बिल्कुल सही कहा।