Friday, April 23, 2010

दिया निमंत्रण सारे जग को


कृष्ण प्रेम रस
भरा ठसा तहस
पत्ती-पत्ती देखूं
हँस-हँस 

प्रेम लुटाने आये गिरिधर
लूट रहे प्रेमी जन मिल कर
दिया निमंत्रण सारे जग को
बंशी बजा कर, रास रचा कर


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ और ५ अगस्त २००५ को लिखी
२३ अप्रैल २०१० को लोकार्पित

2 comments:

रवि कान्त शर्मा said...

बहुत सुन्दर!
मेरा सत चित आनन्दरूप कोई कोई जाने रे....
मैं हूँ साक्षीरूप कोई कोई ही जाने रे....

रवि कान्त शर्मा said...
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