Saturday, December 4, 2010

सुमिरन है पतवार

सुमिरन है पतवार, नाव श्रद्धा, मन केवट है
नदी उसी की है, जिसकी छवि लिए हुए तट है
मुरली धुन में प्रेम बहा कर बुला रहा है
भगा भगा कर छुप जाए, मोहन तो नटखट है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ नवम्बर २००५ को लिखी
४ दिसंबर २०१० को लोकार्पित

2 comments:

Prarthana gupta said...

aesi rachna pad kar mere kanaha prem badhta hi ja raha hai.....

Ashok Vyas said...

प्रार्थना जी
सब बात उसकी कृपा की है
उसका प्रेम बढ़ना सौभाग्य है
बधाई