Friday, September 17, 2010

नदिया सागर संगम


मन मगन प्रेम मनमोहन का
उतरे आँगन आनंद परम

यह प्रीत मेरे नटनागर की
धन अनुपम, पावन और उत्तम

चल श्याम सखा का मुख देखें
देखें नदिया सागर संगम

वह क्रीडामय, मेरा गिरिधारी
देखें जग उसके होकर हम

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ जून २००७ को लिखी
१७ सितम्बर २०१० को लोकार्पित 

1 comment:

Akanksha~आकांक्षा said...

खूबसूरत भावाभिव्यक्ति...सुन्दर प्रस्तुति...बधाई.

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'शब्द-शिखर' : एक वृक्ष देता है 15.70 लाख के बराबर सम्पदा.