Wednesday, March 23, 2011

बचपन की एक सुनहरी याद


एक शून्य से दुसरे शून्य तक
एक खालीपन से दुसरे खालीपन तक
धूल भरी आंधी की तपन में
हाथ-पाँव गल रहे
न पकड़, न जमाव
न दिशा, न गति
ईश्वर का नाम
 बचपन की एक सुनहरी याद सा
गोल- गोल घूमता है
थका थका बोध
मैं नहीं हूँ कहीं भी
और अब भी 
यह ख्वाहिश है
की मै हो जाऊं

अशोक व्यास
१५ मार्च १९९७ को
मुम्बई में लिखी गयी रचना
२३ मार्च २०११को न्यू योर्क से लोकार्पित            

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