Wednesday, April 6, 2011

माखन जैसी मीठी बतियाँ


सखियाँ मिल कर यूँ बतियाएं
आज न पनघट पर हम जाएँ
प्यास बुझायें लीलारस से
नंदनंदन के गीत बनाएं


श्याम सुने और श्याम सुनाएँ
वृन्दावन में मोक्ष उगायें
प्रेम करे ऐसा उजियारा
सूर्यकिरण फीकी पड़ जाएँ


रटे-रटाये पद ना गायें
नूतनता का मोद मनाएं
माखन जैसी मीठी बतियाँ
गोविन्द गोविन्द कह कर पायें


अहा, आज सब श्याम खिजायें
सब कान्हा का स्वांग रचाएं
पर जब बंशी अधर धरायें
स्वर न पायें, श्याम बुलाएं     


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार,  ६ अप्रैल २०११  
       

2 comments:

आलोक मोहन said...

वाह वाह वाह दोस्त सुंदर और सात्विक कविता

Ashok Vyas said...

आनंद रस छलकाए कान्हा
कैसे मिलने आये कान्हा
कस के थाम लिया है अबके
अब जाने न पाए कान्हा

जय श्री कृष्ण