Thursday, January 27, 2011

मैं तुम्हें पहचान नहीं पाता


ये कौन है
जो लिख रहा है
किसी पागल बुढिया के पास
अपने खोये बेटे की बचपन की तस्वीर हो
और वो फूटपाथ पर 
चौराहे पर भटकती हो
ऐसा मेरा हाल है
ना जाने तुम कितने बड़े हो गये हो
भीतर की नगरी में
ना जाने तुम हो कहाँ

शायद जिस तस्वीर को लेकर
मैं तुम्हें ढूंढता हूँ
वो तुमसे मेल ही नहीं खाती
शायद तुम मेरे सामने से निकल गये हो
निकल रहे हो
और मैं तुम्हें पहचान नहीं पाता


अशोक व्यास
(२३ मई १९९८ को लिखी गयी एक लम्बी रचना
का अंश,
२७ जनवरी २०११ लोकार्पित 

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